Wednesday, July 25, 2007

Commemorating today.

Impulsive writing can bring forth a lot of things. Here's some of it.

दुनिया से जब नाराज़ होने क बहाना ना रहा
आजकल खुद ही से गोया परेशान हूँ मैं

जिसके आँसूओं का सैलाब भी सूख गया हो
ऐसा ही एक खंडहर-ओ-वीरान हूँ मैं

खुद पर भी अब किस हद तक तरस करूँगा
अपने ही ग़मों की जीती जागती खान हूँ मैं

जिस शहर में चलती थी कसमें मेरे ईमान की
उसी शहर में आजकल बदनाम हूँ मैं

ज़िन्दगी से हारे हुए बहुत देखे होंगे तुमने
मौत से हारा हुआ पहला इंसान हूँ मैं

जिन कूचों से निकला था काफिला मेरे जश्न का
उन्हीं गलियों में अब अंजान हूँ मैं

मगर इस बात का गुमान आज भी है ...

मिटाने से भी जो नहीं छूटेगा तुम्हारे दामन से
ऐसा ही एक बेगैरत निशान हूँ मैं

2 comments:

  1. U know i can't read this!!!! haha Take care. Tanya
    dimelopapa@gmail.com

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